राष्ट्रीय

18 नवंबर :-जयपुर स्थापना दिवस

जयपुर को एक खूबसूरत शहर के तौर पर एक प्रकांड गणित, ज्योतिष और शिल्प शास्त्री महाराजा सवाई जयसिंह ने बेहरीन योजना तय करके बनाया गया।
इस स्वप्नदृष्टा के स्वप्न को साकार करने का बीड़ा उनके वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य ने उठाया।
आज भी जयपुर दुनिया के खूबसूरत शहरों में शामिल किया जाता है। इसकी स्थापना 18 नवम्बर, 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने की थी। करीब तीन सदी से गौरवशाली इतिहास के साथ बड़ी विरासत को संभाले हुए है जयपुर।
इसकी प्रत्येक इमारत पूर्ण रूप से हितकारी, प्रत्येक सड़क करीने से बनी, प्रत्येक रास्ता आगे से महत्वपूर्ण और जनता की गतिविधियों के क्षेत्र गतिविधियों के नाम से से जाने जाते हैं। आज भी दुनिया जयपुर अपना खास मुकाम रखता है। कला और संस्कृति प्रेमी महाराजा जयसिंह ने सबसे पहले गंगापोल पर जयपुर की नींव रखी।
शुरुआत में जयपुर को 2 लाख की आबादी के लिए बसाया गया था और अब मेट्रो सिटी के रूप में बढ़ते-बढ़ते 70 लाख की आबादी का हो चुका है, करीब तीन सदी से बढ़ते-बढ़ते देश की चुनिंदा मेट्रो सिटी में शामिल जयपुर पूरी दुनिया गुलाबी नगरी (पिंक सिटी) के नाम से भी जाना जाता है।
जयपुर तीन ओर अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है अपने आंचल में खूबसूरती की एक बड़ी और गहरी चादर ओढ़े हुए जयपुर सड़क के किनारे पर बनी गुलाबी रंग की इमारतें इसकी सुंदरता का बखान करती हुई नजर आती हैं, लेकिन इसके अलावा भी कई ऐसी बाते हैं जो जयपुर को दुनिया के बाकी शहरों से अलग करती हैं। जयपुर को देश और दुनिया के सबसे नियोजित और व्यवस्थित शहरों में शुमार किया जाता है। जयपुर जैसी शानदार चारदीवारी किसी दूसरे शहर में देखने को नहीं मिलेगी।”
जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने बतौर शहर जयपुर को बसाने के लिए काफी मेहनत की थी। वास्तुकला-ज्योतिष पर काफी ध्यान दिया था। देश के सबसे प्रतिभाशाली वास्तुकारों में एक वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य का नाम सम्मान से लिया जाता है। प्रजा को अपना परिवार समझने वाले सवाई जयसिंह ने जयपुर को सुंदर शहर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जयपुर को इस तरह से बसाया कि यहां पर नागरिकों को मूलभूत आवश्यकताओं के साथ दूसरी किसी तरह की कमी न हो। सुचारू पेयजल व्यवस्था, बाग-बगीचे, कल-कारखाने समेत कई तरह के प्रयास हुए. वर्षाजल का संरक्षण और निकासी का प्रबंध भी करवाया। यहां तक कि अगले कई सौ सालों में शहर की बढ़ती आबादी को देखते हुए दूरदृष्टि से जयपुर की रचना हुई।
महाराजा सवाई जयसिंह के सपने को साकार करने के लिए सबसे पहले गंगापोल पर राजगुरु पंडित जगन्नाथ सम्राट द्वारा जयपुर की नींव रखी थी!
जयपुर को ब्रह्माण्ड के नौ भागों में विभक्ति के आधार पर नौ वर्गों के सिद्धांत पर बसाया गया। उत्तर को सुमेरू पर्वत का प्रतीक सर्वोच्च स्थान मानकर चौकड़ी सरहद का नाम दिया गया।
जयपुर की दूसरी चौकड़ियों के नाम चौकड़ी रामचन्द्रजी, चौकड़ी गंगापोल, तोपखाना हजूरी,घाट दरवाजा, चौकड़ी विशंभर जी , चौकड़ी मोदीखाना, तोपखाना देश और पुरानी बस्ती रखे गए।
सुव्यवस्थित रूप से बसे शहर में सीधी सड़कों व सीधी गलियों का योगदान महत्वपूर्ण है। सड़क के दोनों तरफ बसा हुआ बाजार, पैदल चलने वालों के फुटपाथ जयपुर की शान में इजाफा करते हैं।
नौ वर्गों के मध्य में शाही वर्गाकार चौकड़ी सरहद के दोनों सिरों पर दो चौपड़ है। एक पूर्वी सिरे पर बड़ी चौपड़ और पश्चिम सिरे पर छोटी चौपड़। बाजारों में फुटपाथों के नीचे वर्षा के पानी को ले जाने के लिए जमीन के बीच बड़े-बड़े नाले बने हुए हैं।
मुख्य सडक 108 फीट चौड़ी अन्य सड़कें 54′, 26′, 13′-6” चौडी हैं। इस प्रकार सड़क के दोनों तरफ दुकान भी निश्चित लम्बाई चौड़ाई की हैं। दोनों चौपड़ों के बीच 160 दुकानें हैं । मुख्य सड़क के दोनों ओर मकानों की ऊचाई आधे से ज्यादा यानी 54′ से ज्यादा नहीं रखी गई !
इस प्रकार इन दुकानों के पीछे की इमारतें क्रमशः कम ऊंचाई की रखी गई जिससे प्रत्येक इमारत को हवा व रोशनी पूर्ण रूप से मिले ।
           इमारतों के सामने के हिस्से इस प्रकार बनाये गये कि सूरज की रोशनी, मुक्त हवा, छज्जे, चारों कोनों पर बड़ें खम्बे, मेहराबें, छोटी-छोटी नाप की खिड़कियाँ जयपुर के जलवायु के लिए बहुत ही खूबसूरत लगती हैं ।
               हवेलियों का निर्माण परिवारों की सुरक्षा हेतु किया गया । प्रत्येक चौकड़ी छोटे-छोटे चौकोर मोहल्लों में विभक्त की गई। प्रत्येक चौकड़ी में करीब 400 मोहल्ले होते थे । इन मोहल्लों के नाम उनमें बसे व्यवसायों के नाम पर रखे जाते थे। प्रत्येक मोहल्ले में अपने-अपने मन्दिर होते थे ।
जयपुर को चारों ओर से सुरक्षित करने के लिए मजबूत चारदीवारी बनाई गई, ताकि यहां परिंदा भी पर न मार सके। जयपुर जैसे खास शहर शहर में घुसने के लिए महाराजा सवाई जयसिंह ने 7 विशालकाय दरवाजे सांगानेरी गेट, अजमेरी गेट, घाटगेट, सूरजपोल, चांदपोल,गंगापोल, जोरावर सिंह गेट बनवाए थे।
न्यू गेट को अजमेरी गेट और सांगानेरी गेट के बीच में बाद में बनाया गया गया, जहां सीधा रास्ता त्रिपोलिया गेट के लिए जाता है जो शाही महल सिटी पैलेस का प्रवेश द्वार बनाया गया था।
इन सभी बड़े गेट पर बड़े दरवाजे और कोट बनाये गए हैं, जहां सुरक्षा बेहद पुख्ता रखी जाती थी। इन्ही दरवाजों को चारदीवारी के जरिए जोड़ा गया ताकि दरवाजों के अलावा कहीं से भी शहर में प्रवेश न हो सके। शहर में घुसने के लिए आज भी यही 8 दरवाजों से होकर निकलना होता है, जिन्हें पार करना उस दौर में भी दुश्मनों के बस में नहीं था। यही वजह है कि रियासती काल में आमेर रियासत को जीतना सभी अन्य रियासतों के लिए एक सपना ही बनकर रह गया।”
         सवाई जयसिंह ने जन्तर-मन्तर का निर्माण किया जो कि ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन में बहुत ही मह॒त्वपूर्ण रहा । जयप्रकाश यन्त्र से लेकर सम्राट यन्त्र तक यह चूने कली पत्थर से बनी वेधशाला एक बेमिसाल निशानी है।
              सवाई जयसिंह के पश्चात्‌ उनके पुत्र ईसरीसिंह ने ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण किया । ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया त्यों-त्यों इसमें योगदान बढ़ता गया । त्रिपोलिया दरवाजे के सामने से एक और बाजार का निर्माण किया गया जो कि दक्षिण में राम निवास बाग तक जाता है । राम निवास बाग के मध्य में अकबर के मकबरे के समान अलबर्ट हाल का निर्माण किया गया जिसमें आजकल स्टेट म्यूजियम स्थित है।
             अन्य महत्वपूर्ण इमारतों में हवा महल प्रमुख है । यह पचास फुट ऊंचा और एक फुट से भी कम चौड़ा है। इसमें बाहर निकलती हुई आठवांसी खिड़कियाँ इस तरह सजी हुई हैं मानो कोई अपूर्ण सिंहासन हवा में झूल रहा हो ।
             सवाई मानसिंह द्वितीय के समय में राजनीतिक स्थिरता थी। इन्होंने प्रजा की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए कई निर्माण कार्य शुरू किये । मेयो हॉस्पिटल जब छोटा महसूस हुआ तो इन्होंने नये जनाने अस्पताल का निर्माण कराने की सोची । महाराजा कॉलेज, महारानी कॉलेज, महारानी गायत्री देवी स्कूल, रामबाग पैलेस, मोतीडूंगरी पैलेस का निर्माण , बॉडीगार्ड लाइन्स (अब शासन सचिवालय भवन), सवाई मानसिंह अस्पताल इत्यादि विशिष्ट भवनों का निर्माण विभिन्न शैलियों एवं वास्तुशिल्प के आधार पर किया गया।
दरवाजे, बाजारों और रास्तों की सुन्दरता और क्रम को ध्यान में रखने साथ-साथ इमारतों के क्रम और सौन्दर्य का भी पूरा ध्यान रखा गया। नगर के बाजारों की इमारतों को एक ही गुलाबी रंग में रंगवाकर वास्तव में मुझे सौन्दर्य की निधि ही बना दिया।
जयपुर को उत्तरोत्तर सुन्दर बनाते जाने का काम सवाई जयसिंह से प्रारम्भ होकर सवाई रामसिंह और सवाई मानसिंह के राज्य तक चलता रहा जिसमें विद्याधर से लेकर मिर्जा इस्माइल तक अनेक उच्च राज्याधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
जयपुर को बतौर शहर वास्तु के मुताबिक बनाया गया।
जयपुर की वास्तु के बारे में कहा जाता है कि इस शहर को सूत से नाप लीजिये, नाप-जोख में एक बाल के बराबर भी फ़र्क नहीं मिलेगा,यही वजह है कि जयपुर को न सिर्फ जयपुर बल्की भारत का पेरिस भी कहा जाता है।”
जयपुर दुनिया का अकेला शहर जिसके पास यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तीन खिताब मौजूद हैं।

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