राष्ट्रीय

रावणा राजपूत समाज का राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न!

हाइफा हीरो मेजर दलपत सिह शेखावत के 104वें बलिदान दिवस के मौके पर रावणा राजपूत समाज का राष्ट्रीय सम्मेलन जोधपुर जिले के रावण के चबूतरा मैदान में आयोजित हुआ!
इस मौके पर देश भर से आए समाज के लोगों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया, वहीं, सभी ने समाज में एकता और मजबूती बनाए रखने को अपने युवाओं को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया,साथ ही एक स्वर में ओबीसी आरक्षण में वर्गीकरण कर आरक्षण देने की भी मांग उठाई,समाज के लोगों का कहना था कि राजस्थान में 8 फीसदी जनसंख्या में भागीदारी होने के बाद भी आज तक उनकी सियासी भागीदारी संतोषजनक नहीं रही है, ऐसे में अब वे जनसंख्या के अनुरूप अपनी सियासी भागीदारी की भी मांग करेंगे!
समारोह को वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला तथा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने संबोधित किया!
समारोह को सम्बोधित करते हुए रावणा राजपूत समाज के प्रदेशाध्यक्ष रणजीत सिंह सोडाला ने कहा कि मुझे यह बताते हुए बहुत ही गर्व हो रहा है की महासमेल्लन में लाखो की संख्या में लोग हम से जुड़े और अपना सहयोग दिया।
मैं सभी लोगो को धन्यवाद कहना चाहता हूं की उन्होंने अपने कीमती समय मैं से कुछ समय इस समाज को दिया व सभी के उत्साह और जोश को देख हमारा यह महासमेल्लन एक ऐतिहासिक महासम्मेलन बना।
सम्मेलन में मुख्य रूप से निम्न मांगे सरकार के सामने रखी गई!
1. पद सूचक नामों को हटाकर राजस्व रिकॉर्ड में शुद्धिकरण के साथ एक नाम रावणा राजपूत किया जावे।
2. गुर्जरों की तरह अत्यन्त पिछड़ा वर्ग बनाकर रावणा राजपूत सहित अन्य अत्यन्त पिछड़ी जातियों को अलग से आरक्षण दिया जावे।
3. हाइफा हीरो मेजर दलपत सिंह जी देवली साहब की शौर्यगाथा को राजस्थान व केन्द्रीय बोर्ड के पाठयक्रम में शामिल किया जावे।
4. मेजर साहब के पैतृक गांव देवली में हाइफा हीरो मेजर दलपत सिंह जी देवली का पैनोरमा बनाया जावे।
5. हाइफा हीरो मेजर दलपत सिंह जी देवली साहब को भारत रत्न दिया जावे।
6. शासन प्रशासन एवं राजनीतिक न्युक्तियों में रावणा राजपूत समाज को संख्या अनुपात में भागीदारी दी जावे।

मौके पर समाज के वक्ताओं ने कहा कि राजस्थान में हमारा समाज 25 से 28 सीटों पर सियासी रूप से प्रभाव रखता है, बावजूद इसके हमारी सियासी भागीदारी संतोषजनक नहीं है, वर्तमान में समाज से केवल दो ही विधायक हैं, जबकि यह संख्या और ज्यादा हो सकती है, इसके लिए राजनीतिक दलों को अपनी शक्ति बतानी होगी!
इजरायली दूतावास के प्रतिनिधि ने दिया ये संदेश: समारोह में इजरायली दूतावास के प्रतिनिधि ने भी अपना संदेश दिया,उन्होंने कहा कि मेजर दलपतसिंह हमेशा अपने योगदान के लिए याद किए जाते रहेंगे,उनकी वजह से ही आज हाइफा शहर इजरायल का हिस्सा है हम सभी उनके प्रति कृतज्ञ हैं!

मेजर दलपतसिंह शेखावत देवली(रावणा राजपूत )
व साथियों के शौर्य की गाथा।

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय ब्रिटिश की सँयुक्त सेना जिसमें ब्रिटेन, मैसूर लांसर्स व मारवाड़ की सेना सम्मिलित थी, को एक बेहद मुश्किल जमीनी युद्ध मे तुर्की सेनाओं से युद्ध लड़ना था। 23 सितम्बर 1918 को उस युद्व का एक बेहद अहम दिन था। ब्रिटिश भारत की इस सेना की कमान मेजर दलपतसिंह शेखावत की पास थी।
मेजर ने जब देखा कि शत्रु पक्ष बेहद मजबूत स्तिथी में था एवं तोपों से सुसज्जित था। उनकी तोपें आग उगल रही थी एवं उन तोपचियों का निशाना बड़ा सटीक व तोपो की मारक क्षमता बेहद खतरनाक थी।

मेजर दलपत सिह रावणा राजपूत 600 घुडसवारों की पलटन का नेतृत्व कर रहे थे।
तब मेजर ने उन तोपों को शांत करने के लिए के लिए, तोपचियों को हलाक करने के लिए एवं इन तोपों के पीछे छुपी शत्रु सेना को नेस्तानाबूद करने के लिए युद्ध का परम्परागत, हौलनाक व खुरेंज कदम उठाया जिसे राजपुताना में “साका करना” कहा जाता है।

मेजर ने तमाम घुडसवारों को 2 किलोमीटर दूर कयामत बरसा रही तोपों पर बिजली की गति से एक साथ हमला कर दुश्मन को चकित करते हुए खत्म करने का आदेश दिया।

मेजर के नेतृत्व में 600 घुडसवारों ने अपने हाथों में भाले व तलवार थाम कर शत्रु पर तेज, अचानक व हौलनाक चढ़ाई कर दी।
घुडसवारों के इस दल की तेजी दिल दहलाने वाली थी। उनके हाथों में तलवारें बिजली की मानिंद चमक रही थी। तोपों से शोले निकल रहे थे। वातावरण तोप के गोलों की आवाजों, घोड़ो की पदचापों व हथियारों की खनक से गुंजायमान हो रहा था। घुड़सवार तोपों की तरफ अग्रगामी थे उनके सीने शोलों से टकरा रहे थे। ऐसा विहंगम दृश्य देखकर वक्त रुक गया था। ऐसी भीषण टक्कर “ना भूतों ना भविष्यति” समान थी।

मेजर दलपतसिंह जी रावणा राजपूत का तनबदन लहलुहान हो रहा था लेकिन शरीर पर लग रहे घाव की फिक्र रणबांकुरों का कहा होती है वे तो कंधे पर सर ना रहने पर भी युद्ध का मैदान नही छोड़ते है। मेजर व उनके वीरवर घुडसवारों ने चंद लम्हो में ही तोपों के सर पर पहुँच गए। उनकी तलवारों ने तोपचियों को खामोश कर दिया। शत्रु वीरता से लड़े लेकिन सर पर कफ़न बांधे दरिया के समान आगे बढ़ते मेजर व उनके घुडसवारों के सामने अधिक देर नही टिक सके।
इस अदभुत, हैरतअंगेज व दिल को दहला देने वाली जंग में मानो काल नृत्य कर रहा था। चारों तरफ बारूद की गंध पसरी थी व इस गन्ध में रक्तरंजित शवों से निकलते रक्त की नदी ने मिलकर रणभूमि को लहलुहान कर दिया था। मेजर व उनके साथियों ने मोर्चा फतह कर लिया था। दुश्मन नेस्तनाबूद हो चुका था। तोपों के मुँह खामोश हो गए थे। मेजर के साथियों ने विजय पताका फहरा दी थी।
मेजर के घुड़सवार शान से मोर्चा फतह कर बेस की तरफ लौट रहे थे। जंग जीत चुके जँगजुओ के चेहरे सूर्य के समान प्रकाशित थे लेकिन उनके ह्र्दयांचल में अपने साथियों के बिछडने की गहरी कसक शूल के समान चुभ रही थी। वे लौट रहे थे लेकिन 600 नही थे।

उन्होंने स्वर्णिम इतिहास रच दिया था। उनका नाम विश्व के श्रेष्ठ लड़ाकों में शुमार हो चुका था। उन्हें वह सम्मान मिल चुका था जिसके सामने सर झुक जाते है।

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